बुधवार, 17 जुलाई 2013

१० बूंदी राज्य चौहान राजवंश( हाड़ा )चौहान

बूंदी राज्य :- हाड़ा चौहानों की प्रसिद्ध खाप रही है | लक्ष्मण नाडोल के पुत्र ( अश्वपाल ,अधिराज ) के पुत्र माणक राव हुए | माणक के बाद क्रमश सांभरण ,जैतराव ,अनंगराव ,कुंतसी,विजयपाल व् हरराज (हाड़ा ) के वंशज कहलाते है | हरराज के बाद क्रमश बंगदेव और देव हाड़ा हुए | देव हाड़ा ने मीणों के बम्बावदे स्थान को जीतकर बूंदी राज्य की स्थापना की | वि.सं.१२९८ को देवा द्वारा  बूंदी राज्य की स्थापना मानी गयी हे | कुछ इतिहासकारों ने १३९८ बताया है | नेणसी ने अपनी ख्यात में लिखा हे की देवा हाड़ा भैसरोड नामक स्थान पर रहता था | उसकी पुत्री का विवाह राना अरिसिंह के साथ हुआ | अरिसिंह की सहायता से उसने मीणों से बूंदी क्षेत्र जीता | ओझाजी ने देवा हाड़ा को अरिसिंह का समकालीन न मानकर हम्मीर का समकालीन बताया है और देवा को बूंदी दिलाने का श्रेय राना हमीर को दिया है |
मैनाल का १४४६ वि.का शिलालेख हाड़ा मालदेव का है जिससे वंशक्रम इस प्रकार है :- देवा ,रतपाल ,केलण ,कुंतल व् महादेव | इस शिलालेख में लिखा है की उसकी तलवार शत्रुओं की आँखों में चकाचोंध उत्पन्न कर देती थी | उसने दिलावर खां गोरी पर अपनी तलवार उठाकर मेवाड़ के स्वामी खेता की रक्षा की | सुल्तान की सेना को अपने पैरोतले कुचलकर नरेन्द्र खेता को विजयी दिलाई | अतः सिद्ध होता हे की खेता महादेव का समकालीन था | खेता की म्रत्यु वि.१४३९ में महादेव हाड़ा मोजूद था |
महादेव हाड़ा से देवा चार पीढ़ी पूर्व था अतः देवा का समय चार पीढ़ियों का समय 80 वर्ष पीछे पर तो १४३९-80=१३५९ के करीब पड़ता है | इस समय राना लक्षमणसिंह शीशोदा का पुत्र अरिसिंह जीवीत था | अरिसिंह ने वि.सं .१३६० में अलाऊधिन की सेना के विरुद्ध चितोड़ की रक्षा में आपने प्राण न्योछावर किये थे | देवा का बूंदी लेना १३९८ वि. में माना जाता है | १३९८ देवा के बुढ़ापे का समय होगा तभी अगली पीढ़ियों को कम समय मिला | इस द्रष्टि से देवा अरिसिंह और उनके पुत्र हम्मीर दोनों के हि समकालीन था |
बंगदेव (बांगा) के दो पुत्र देवा के द्वारा बूंदी पर अधिकार करने के बाद use तुगलक सुल्तानों से भी संघर्ष करने पड़े | देवा हाड़ा थोड़े समय हि बूंदी पर शासन कर सके | उसके बाद उनके पुत्र समरसिंह बूंदी के शासक हुए | समरसिंह ने अपने पिता के राज्य का विश्तार किया टाड ने लिखा है की समरसिंह ने कोटा पर अधिकार किया समरसिंह के बाद नरपाल (नापा ) बूंदी के शासक हुए |उनके क्रमश हमीर ,वीरसिंह व बेरिशाल शासक हुए | मांडू के सुल्तान महमूद ने बूंदी पर कई आक्रमण किये | इन आक्रमणों का मुकाबला करते हुए बैरिशाल युद्ध में काम आये और बूंदी पर शत्रु का अधिकार हो गया | परन्तु कुछ हि समय बाद बैरिसाल के पुत्र भाणदेव (भांडा) ने बूंदी मांडू के सुल्तान से छीन ली | भाणदेव के उतराधिकारी नारायणदास ने सुल्तान के सेन्य प्रबंधक समर बेदी और उसके पुत्र दाउद को मारकर बूंदी पर पूरण रूप से अधिकार कर लिया | राना रायमल के समय मालवा के सुल्तान गयासुधिन ने चितोड़ पर आक्रमण किया तब नारायणदास मेवाड़ के पक्ष में लड़े तथा खानवा युद्ध में भी वीरता प्रदर्शित की | टाड ने लिखा हे की नारायणदास के दो चाचा अमरसिंह व् समरसिंह मुसलमान बन गए और जब उन्होंने बूंदी पर आक्रमण किया तब नारायणदास ने दोनों को मार डाला|
नारायणदास के बाद सूरजमल बूंदी के शासक हुए | सूरजमल की चचेरी बहिन करमेती राना सांगा की राणी थी जिसके विक्रमादित्य व् उदयसिंह दो पुत्र थे | सांगा की म्रत्यु के बाद करमेती ने आपने दोनों पुत्रों सहित सूरजमल के संरक्षण में रणथम्भोर रही थी | मेवाड़ के राना रतनसिंह व् सूरजमल वि.सं. १५८८ में आपस में लड़कर दोनों ऐक दुसरे के शास्त्रों से मारे गए | सूरजमल के बाद उनके पुत्र सुरतान गद्दी बेठे | सुरतान के कोई पुत्र नहीं था | अतः नारायणदास के भाई नारबदके पोत्र व् अर्जुन के पुत्र सुरजन गोद आये और बूंदी के सिंहासन पर बैठे | सुरजन बड़े वीर हुए | अकबर ने रणथम्भोर पर आक्रमण का कड़ा मुकाबला किया | अकबर  ने दुर्ग जीतने के बहुत प्रयास किये पर उसका मनोरथ पूर्ण न हुआ तब मानसिंह के मध्यस्ठ होने पर अकबर ने सुरजन के साथ सम्मान पूर्ण संधि की | यह घटना फरवरी १५६९ वि १६२५ की है | राव सुरजन अकबर के शासक काल में पंच हजारी मनसबदार थे | उनकी दानशीलता के कारन राव सुरजन का काशी क्षेत्र में बहुत यश फैला | काशी में हि राव सुरजन की वि.सं.१६४२ में म्रत्यु हुयी |
राव सुरजन के बाद क्रमशः भोज व् रतनसिंह बूंदी के शासक हुए | जहाँगीर के समय रतनसिंह दक्षिण में था | तब उनके पुत्र माधोसिंह बुरहानपुर दुर्ग में थे | खुर्रम (शाहजहाँ ) द्वारा जहागीर के विरुद्ध करने पर उसे बुरहानपुर केद में रखा गया | रतनसिंह के संकेत से माधोसिंह व् द्वारकादास शेखावत ने खुर्रम को केद से निकाल दिया था | रतनसिंह के बाद उनका पोत्र छत्रसाल ( गोपीनाथ का पुत्र ) गद्दी पर बैठा | छोटे पुत्र माधोसिंह को कोटा का राज्य प्राप्त हुआ | छत्रसाल ने बादशाह शाहजहा के समय बीजापुर ,गोलकुंडा आदी अनेक युधों में वीरता दिखाई | इस कारन शाहजहाँ इनका बड़ा सम्मान करता था | शाहजहाँ के समय इनका तीन हजार जात व् दो हजार सवार का मनसब था |
शाहजहाँ के पुत्रों में हुए उतराधिकार के युद्ध में छत्रशाल ने दारा के पक्ष में तलवार बजायी | इसी युद्ध में वि.१७१५ में छ्त्रशाल वीरगति प्राप्त हुआ | छ्त्रशाल के बाद उनके पुत्र भावसिंह बूंदी के शासक हुए | यह भी अच्छे वीर थे | भावसिंह के कोई पुत्र नहीं था | अतः उनके भाई भीमसिंह के पुत्र अरिरुधसिंह बूंदी के शासक हुए | ओरंगजेब के पक्ष में वे मराठों के विरुद्ध लड़े | इसके अतिरिक्त इन्होने अनेक युधों में राजपूती शोर्य का परिचय दिया | इनकी म्रत्यु वि.१७५२ में हुयी | तत्पश्चात उनके पुत्र बुद्धसिंह गद्धी पर बैठे | पर सवाईसिंह जयसिंह ने बुधसिंह को हराकर दलेलसिंह को बूंदी राज्य सोंप दिया और इनके बाद बुधसिंह के पुत्र उम्मेदसिंह को गद्धी मिली | उम्मेदसिंह धार्मिक प्रवति के व्यक्ति थे | यह बड़े वीर थे बूंदी को प्राप्त करने के लिए उनको काफी संघर्ष करना पड़ा | उनके बाद क्रमशः अजीतसिंह ,विष्णुसिंह व् रामसिंह बूंदी के शासक हुए | महाकवि सूर्यमल्ल मिश्रण इन्ही के आश्रय में वंशभास्कर ,वीर ,सतसई ,आदी ग्रन्थ लिखे | इनके बाद क्रमश रघुवीरसिंह ,ईश्वरसिंह व् बहादुरसिंह बूंदी के शासक रहे | बहादुरसिंह के समय भारत स्वतन्त्र हुआ और इसके बाद देश की अन्य रियासतों के साथ बूंदी रियासत भी भारत में विलीन हो गयी |

बूंदी राजवंश
१.देवाजी (१३४२-१३४३)
२.समरसिंह (१३४३-१३४६)
३.नरपाल (१३४६-१३७०)
४.हम्मीर (१३७०-१४०३)
५.वीरसिंह (१४०३-१४१३)
६.बैरिशाल (१४१३-१४५९)
७.भाणदेव (१४५८-१५०३ )
८.नारायणदास (१५०३-१५२७)
९सूरजमल (१५२७-१५३१)
१०.सुरतान (१५३१-१५५४)
११.सुर्जन(१५५४-१५८५)
१२.भोज (१५८५-१६०८)
१३.रतनसिंह (१६०८-१६३१)
१४.छत्रसाल (१६३१-१६५८)
१५.भावसिंह (१६५८-१६८१)
१६.अनिरुद्धसिंह (१६८१-१६९५)
१७.बुद्धसिंह (१६९५-१७२९)
१८.दलेलसिंह (१७२९-१७४८)
१९.उम्मेदसिंह (१७४८-१७७१)
२०.अजीतसिंह (१७७१-१७७३)
२१.विष्णुसिंह (१७७३-१८२१)
२२.रामसिंह (१८२१-१८८९)
२३.रघुवीरसिंह (१८८९-१९२७)
२४.ईश्वरसिंह (१९२७-१९४५)
२५.बहादुरसिंह (१९४५ )

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